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पोषण आहार के नए प्लांट एमपी एग्रो को दिए, बिना चर्चा के प्रस्ताव पास

महिला स्वसहायता समूहों के फेडरेशन के लिए तैयार हो रहे पोषण आहार बनाने के सात नए प्लांटों के संचालन का जिम्मा राज्य सरकार ने एमपी एग्रो को सौंप दिया है। कैबिनेट की बुधवार को हुई बैठक में अतिरिक्त एजेंडे के रूप में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने यह प्रस्ताव रखा, जिसे बिना चर्चा के एक मिनट में पास कर दिया गया। ये वही एमपी एग्रो है, जिससे जुड़ी पोषण आहार सप्लायर कंपनियां पूर्व में सुर्खियों में रहीं। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तत्कालीन भाजपा सरकार ने इन कंपनियों से पोषण आहार का काम वापस लेने का फैसला किया था।  

टेंपरेरी व्यवस्था भी एक साल से कंपनियों के ही हाथ में 

  • एमपी एग्रो न्यूट्री फूड प्राइवेट लिमि., एमपी एग्रो टॉनिक्स लि. और  एमपी एग्रो फूड इंडस्ट्रीज के साथ ही अप्रैल 2018 में जुड़ीं चार कंपनियां जयपुर की फ्लोरा फूड, कोटा की कोटा दाल मिल, दिल्ली की सुरुचि फूड और नोयडा की बिहारी एग्रो फूड भी मप्र में पोषाहार की सप्लाई कर रही हैं।
  • ताजा रिपोर्ट के अनुसार महिला स्व सहायता समूहों के फेडरेशन (नए प्लांट) सिर्फ साढ़े चार से पांच हजार टन ही पोषाहार उपलब्ध करा पा रही हैं। सालाना कुल जरूरत के बचे हुए 7000 टन की सप्लाई अभी भी कंपनियों के हाथ में है।
  • सितंबर 2019 में कैबिनेट बैठक ने दिसंबर 2019 तक इन्हीं सात कंपनियों से पोषाहार सप्लाई लेने की मंजूरी दी है। इस उम्मीद में कि स्व सहायता समूहों के सभी प्लांट चलने लगेंगे। लेकिन एेसा नहीं हुआ।

डेढ़ साल में एक भी प्लांट शुरू नहीं हाे सका

  • वर्ष 2017 में पोषण आहार सप्लायर कंपनियों पर विवाद हुआ तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर स्व सहायता समूहों से पोषण आहार का काम कराने का फैसला हुआ।
  • मार्च 2018 में शिवराज कैबिनेट ने इसे मंजूरी दी। तय हुआ कि अक्टूबर 2018 तक काम महिला स्व सहायता समूहों के फेडरेशन के पास होगा, लेकिन एेसा नहीं हुआ। 
  • पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अधीन राज्य आजीविका मिशन के पास 7 नए प्लांट बनाने का जिम्मा था, लेकिन डेढ़ साल में एक भी पूरी तरह शुरू नहीं हो सका। 
  • विभाग ने यह भी दलील दी है कि वह इन्हें आगे चला पाएगा। इसलिए एमपी एग्रो को इन्हें सौंप दें।
  • लिहाजा अभी भी हर माह करीब 50 से 60 करोड़ रुपए मूल्य के पोषाहार की सप्लाई का काम निजी क्षेत्र की कंपनियों के पास है।

सरकार का तर्क

ग्रामीण विकास विभाग ने तर्क दिया है कि स्व. सहायता समूहों के इस स्टाफ को एक साल में ट्रेंड किया जाना था। लेकिन आजीविका मिशन ने इस पर काम नहीं किया। एमपी एग्रो को पूर्व का अनुभव है, इसलिए उसे प्रबंधन का काम दिया।

7 लाख कर्मियों की समस्याएं निपटाने बनेगा आयोग
इसके अलावा कैबिनेट ने प्रदेश के 7 लाख कर्मचारियों की सेवा संबंधी समस्याओं के निराकरण के लिए कर्मचारी आयोग का गठन करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। आयोग में चार सदस्य और एक कर्मचारियों का प्रतिनिधि होगा। यह जो भी निर्णय देगा, उसे मानना बाध्यकारी होगा। अभी प्रदेश में कर्मचारियों के ट्रांसफर से लेकर वेतन विसंगति के मामले हाईकोर्ट में जाते हैं। इससे कर्मचारियों के प्रकरण कोर्ट में लंबित रहते हैं।  ऐसे करीब एक लाख मामले कोर्ट में हैं। इसमें सरकार को हर साल 50 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करना पड़ते हैं।

ऐसे काम करेगा आयोग
यदि कोई कर्मचारी आयोग में मामला ले जाएगा तो उसके पक्ष में फैसला आते ही संबंधित विभाग को यह मानना पड़ेगा। प्रदेश में हर साल 40 से 50 हजार ट्रांसफर होते हैं, जिनमें से 5 हजार मामले तबादला निरस्त के कोर्ट में पहुंचते हैं। कोर्ट तबादला निरस्त करने का आदेश देता है तो उसे माना भी जाता है। इस सारी प्रक्रिया के पहले नौकरशाही का अड़ियल रवैया सरकारी नियमों के पालन में ही रोड़ा अटकाता है। 

कैबिनेट में यह भी फैसला

  • प्रदेश में डाॅक्टरों की कमी को दूर करने के लिए एमबीबीएस और पीजी विशेषज्ञ डाक्टरों को एक साल की इंटर्नशिप ग्रामीण क्षेत्रों में करना आवश्यक होगा।
  • आदिवासी की जमीन हो सकेगी डायवर्ट : सरकार ने अधिसूचित जिलों में सामान्य वर्ग के लोगों की जमीन होने पर उसके डायवर्सन की अनुमति दे दी है। अभी तक आदिवासी बहुल जिलों में यदि सामान्य वर्ग के लोगों की जमीन होती थी, तो 10 साल तक वे उसका डायवर्सन नहीं करा सकते थे। नई व्यवस्था में झाबुआ यदि झाबुआ जिले में सामान्य वर्ग के लोग जमीन का डायवर्सन करवाकर उसका व्यावसायिक उपयोग कर पाएंगे।
BJ-2589 2019-11-28 11:24:20 भोपाल
  • पोषण आहार के नए प्लांट एमपी एग्रो को दिए, बिना चर्चा के प्रस्ताव पास

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